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गाँव के पग-पग में मिट्टी की सुगंध – निलान्जय के संग

निलान्जय Part 1 – “चल पड़ा में कैमरा उठा सुबह की भोर में जा पंहुचा धरुआ गाँव” जहां की खूबसूरती और नजारा देख कर लग रहा था जैसे की में किसी हजारो साल पहले के किसी प्राचीन गाँव में आ गया हूँ । वो पुरानी लकड़ी का दरवाजा मिट्टी की सुगंध और घर के बाहर कुएं की मौजूदगी देखकर लग रहा था की यहाँ के लोगो में अभी भी इतिहास में रूचि और रचना बाकि हैं।IMG-20170209-WA0026
दूर दराज़ शहर से दूर गाँव में शांति और एकता का एहसास दिख रहा था शहर व्यस्त ज़िन्दगी से बढ़िया गाँव आबो हवा है। जहां छोटे बड़े जानवर के फ़ोटो लेने पर जानवरों को एहसास हो जाता है की कोई अपना है।IMG-20170209-WA0025 छोटी सी बात-चीत से बड़े बुर्जग का आशीर्वाद मिला , गाँव के लोगो का प्यार, स्नेह ,दुलार के साथ साथ घर के खाना का भी आनंद मिला। वोही पीपल के पेड़ के नीचे लगा बड़े बुजुर्गो दरबार, पाठशाला का टन – टन करता घंटा और बच्चों का जोर-जोर पड़ने की आवाज़ आना। लोगो का इस ठण्ड में नेहर के किनारे आग का आनंद लेना। मुझे देखकर मुस्कुरा देना और घर के दूर ऊपर छत पर जाने की इजाजत देना और छत से गावँ का वो आनंद मह नज़ार, गुरुद्वारा से आ रही मधुर धुन सीधे कानो सुनाई दे रही थी और चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी का बड़ी- बड़ी दीवारों का अक्स सूरज की रौशनी से भरपूर उजागर में तस्वीर पेश कर रही थी।
* धरुआ गाँव का ऐतिहासिक दृश्य , गाँव वालो का गुरुद्वारे से लगाव*

गाँव के शुरुवात में ही स्थित नेहर जो अपने में एक बेहतरीन आकर्षण का केंद्र था। वही मुझे गुरुद्वारे से आ रही मधुर धुन का एहसास होना लगा गुरुद्वारे के इतिहास के बारे में जानकारी लेने के लिए मेरी उत्सुकता बदती जा रही थी। वहां लगा बुजुर्गो का दरबार और उनकी हँसी ठिठौली साफ़ साफ़ वहाँ की IMG-20170209-WA0024परेशानीयो को छुपाने की कोशिश कर रही थी। हम निकल पड़े काम के लिए तो हर चीज जो सामने दिख रही थी वो कुछ बोल रही थी और कुछ बताने की कोशिश कर रही थी। इसलिए हमे पताः भी चल रहा था। इस ऐतिहासिक गावँ में गुरूद्वारे की हर जगह मौजूदगी ही ये बता रही थी की ये इतिहास का वो पन्ना है जिसे लिखा नहीं गया लेकिन यहाँ के लोगो द्वारा अभी भी सहेज कर रखा गया है। धार्मिक एहसास और एक गाँव में इतने गुरुद्वारों का होना जिसकी शायद ही किसीको गिनती न की हो।IMG-20170209-WA0022

बचपन तो हमारा खो गया, चला गया और शायद वो वापस भी ना आपाये लेकिन यहाँ की तस्वीर हमें बचपन से जोड़ रही थी। वो व्यापार जो बहुत पहले ही विलुप्त हो गया था। आज देखने को मिला और वो याद आया जब हम कबाड़ बेचकर चूरन खाते थे। जब मैंने इस बारे में जानने की कोशिश की तो पता चला बेशक इससे उन्हें फायदा तो नहीं होता लेकिन बच्चों की ख़ुशी और बच्चों का उनके लिए इंतज़ार ही उनकी कमाई है। यह देख कर अच्छा लगा की इस तरह के व्यापार को ज़िंदा रखने वाला भी कोई है।

इस दौरान हमे लुप्त हुए इस ऐतिहासिक गाँव के बारे में बहुत कुछ जानने को मिला और यह गाव अपने में एक अलग मुकाम हासिल करने लायक है। ना किसी को कोई परेशानी थी और न किसी चीज की शिकायत थी , था तो बस एक चीज जो उनके आंखो में साफ़ देखने को मिल रहा था। हर वो आदमी कहना तो चाह रहा था पर कोई कह नहीं पा रहा था। आखीर में एक बुजुर्ग ने कह भी दिया
बेटा ये गाँव हमारा उस शहर से अच्छा है जहाँ हर सुविधा तो है लेकिन आपस में मेल जोल कोई रिश्ते नाते बहुत है। उस बुजुर्ग का ये कहना साफ़ बता रहा था वहाँ परेशनिया तो हैं लेकिन उनके आपस में मेल जोल के वजह से उस गाँव को खूबसूरती से सहेज कर रखा गया है और पग पग में खूबसूरती की उमंगें है जहा आज भी बहु बेटिया सुरक्षित है लोगो की आखो में शर्म हया है कुछ इस तरह गाँव के पग-पग में मिट्टी की सुगंध मिली मुझे ।

 

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