Friday, October 18, 2019
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…. और क्या लिखूं गांधी पे…

सबसे पहले तो आप सबको गांधी जयंती की हार्दिक शुभकामनाएं,
एक बात स्पष्ट कर दूं कि मै कोई लेखक नहीं हूं न ही हिन्दी का कोइ विद्वान लेकिन चूंकि गांधी जयंती का अवसर है और इधर कुछ सालो में गांधी-गोडसे गठबन्धन के वजह से ये अवसर कुछ ज़्यादा लाइम लाइट में है, तो मैंने सोचा क्यों ना इस मौके का लाभ हम भी ले और लिख दे गांधी जी को।।
मगर फिर दिल में खयाल आता है कि क्या गांधी को लिखना इतना आसान है, और आज के समय यह लेख किस रूप में पढ़ा जाएगा क्योंकि गांधी जी को आज कल तो व्यंग के रूप में भी ट्रेंडिग कर दिया है कुछ महानुभावों ने।।
खैर जो भी है जैसा भी है चलिए लिखते है, क्योंकि मुझे पता है गांधी जैसे शालीन व्यक्तिव को लिखने के लिए मुझे किसी भारी भरकम शब्दों की आवश्यकता नहीं पड़ेगी और ना ही मुझे शब्दों का तानाबाना बैठाना पड़ेगा, एकदम आम भाषा में लिखूंगा और ऐसी भाषा जो हमारे विश्वविद्यालय के प्रोफेसर साहब से लेकर हमें विश्वविद्यालय ले जाने वाला टैम्पो वाला भी समझ लेगा। लेख का थीम भी ऐसा रखूंगा की कोई उसको पूरा पढ़े बिना छोड़ेगा नहीं हलाकि अंततः पसंद आयेगी ही इसकी गारंटी नहीं ले सकता।।
चलिए भाषा तो सब समझ लेंगे मुद्दा भी वो नहीं है, लेकिन क्या हर कोई उस लेख में छुपे गांधी को और उसके विचारों को समझ पाएगा, चलिए अगर उनके विचारों को समझ भी गए तो क्या उनसे सहमत हो पायेगा, चलिए मान लिया सहमत भी हो गए लेकिन क्या उस सहमति को सार्वजनिक रूप से प्रकट कर पाएगा? ये कुछ ऐसे विचार है जो मुझे लेख लिखने से रोक रहे है।
चलिए मैं तो लिखूंगा ही क्योंकि ट्रेंडिग जो होना है।।

लेकिन उस लेख को पढ़ने से पहले आपको भी सोचना होगा कि क्यों और कैसे कोई गांधी बनता है, क्या सिर्फ सफेद कपड़े पहन कर या फिर अहिंसा को साथ लेकर दो चार क्रांतिकारी बातें कर देने से या फिर एक आधा राजनीतिक पार्टियों और उनके विचारों का विरोध करके या गांधी नाम लगा लेने से कोई गांधी बन जाता है।
नहीं, गांधी एक विचार है जो अनवरत और अमर है।
आज भले ही गांधी और भगत सिंह की तुलना करके हम उनकी आलोचना कर दे लेकिन हमें याद रखना चाहिए उस समय भगत सिंह को भी ये पता था कि गांधी के बिना उनकी लड़ाई अधूरी है।
आज भले ही भगत सिंह और सुभाष चन्द्र बोस की टी-शर्ट पहनने वाले लोग गांधी जी की आलोचना करके अपनी देशभक्ति साबित करने में लगे हो लेकिन एक समय ऐसा आएगा जब उनको भी गांधी और उनके विचारों की आवश्यकता फिर से महसूस होगी।
और शायद तब मेरे लेख की भाषा के साथ साथ उसका भाव भी सबको समझ में आ जाएगा।।
चलिए वो लेख उसी दिन के लिए बचा लेते है, तब तक मैं भी सोच लूंगा की ” और क्या लिखूं गांधी पर” ।।

लेखक-
हर्षित उपाध्याय
विधि छात्र, लखनऊ विश्वविद्यालय

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