Thursday, October 1, 2020
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कविता ‘ईश्वर की सौगात’ – लेखिका ओम सिंह

लेखिका की कल्पना
(एक बेटा आज बहुत दिनों बाद त्यौहार पर अपने घर लौटा है)

*ईश्वर की सौगात*

महीनों बाद आज जब अपने घर को लौटा,
बरामदे में बैठे मां पापा को
बेसब्र अधीर निगाहों से,
पल-पल अपना इंतजार करता हुआ पाया।
मुझे देखते ही मां दोनों बाहें फैलाए,
मेरी ओर दौड़ पड़ी
अहा! इस गहरी ,शांत और ममता भरी गोद में छुप कर,
भूल गया एक पल को
दफ्तर, बॉस, लोन, बिल, दोस्तों से अनबन
वो भागदौड़ ,तनाव भरी रोजमर्रा की जिंदगी।

मुझे देखते ही पापा मेरे लिए भागकर लाए,
मेरी मनपसंद गरमा गरम रबड़ी इमरती
और भी ना जाने क्या क्या।
हर पिता की ख्वाहिश जैसी
कि बेटा खूब मजबूत ,बलवान, ऊर्जावान, ऐश्वर्यावान और दीर्घायु बने,
जिस पर वह बार-बार जान निछावर कर दें।

हां यह जरूर है………
कि आज मां पापा को थोड़ा कमजोर
और ढला हुआ पाया मैंने।
मां के चेहरे की झुर्रियों में
छुपी हुई निर्बल आंखें
कभी गठिया का दर्द कभी कमर की पीड़ा….
रह रहकर मां को बैठने को मजबूर कर देती…..
वो मां, जो मेरे आने पर
रसोई को अपना घर बना लेती….
सारे पकवान एक ही दिन में खिला दे….
ऐसी चाहत लिए मेरी मां!

पापा ने अपने हाथों से पकड़ कर
एक-एक पग चलना सिखाया।
रिटायरमेंट के बाद
आज छड़ी का सहारा लेकर
चलते फिरते दिखते।
बीत गया समय…. वक्त की तेज धार……
आज मां पापा कमजोर हो गए हैं….
जितना स्नेह- प्रेम -ममता -समय अपनापन,
उन्होंने मुझ पर लुटाया,
जान तक हर पल कुर्बान करने को तैयार,
*मां पापा*
क्या मैं यह सब कभी लौटा पाऊंगा
जिस धाक से मैं अपने( मां पापा के)घर में रहता था,
क्या उसी अधिकार से मां पापा मेरे (बेटे बहू के) घर में रह पाएंगे??
बिना किसी संकोच और हिचकिचाहट के,
क्या वो अधिकार ,वो अपनापन, वो स्नेह, वो जान लुटाने वाली ममता,
मैं कभी दे पाऊंगा???????
नहीं…. शायद कभी नहीं…
क्योंकि
मां पापा तो साक्षात ईश्वर हैं,
इस धरती पर,
और
ईश्वर की सौगात कभी
लौटाई नहीं जाती।।।।
*ओम*

ओम सिंह (लेखिका)

चैतन्य वेलफेयर फाउंडेशन की अध्यक्ष व मनोवैज्ञानिक है