Monday, August 10, 2020
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भक्ति या पागलपन

लखनऊ – रविवार की सुबह चार बजे मेरी गाड़ी बड़ी तेजी से भागती जा रही थी। मेरी नींद थी जो टूट ही नहीं रही थी। जोर के झटके, ट्रैफिक, शोर सब कुछ नींद के आगे हारते दिखाई दे रहा थे। अंततः ड्राइवर ने कहा दीदी क्या सारनाथ रुकना है?..हां-हां अचानक चौंक कर मैं नींद से जाग गई। सारनाथ का भ्रमण कर मैं वाराणसी की ओर बढ़ी। हर थोड़ी देर बाद “बोले बम, बोले बम” की गूंज बाबा के त्रिशूल की भांति आत्मा को भेज रही थी। मानों याद दिला रही थी कि धन्य भाग्य कि आप बाबा की नगरी काशी में हैं। होटल पहुंच कर मैंने एहसास किया कि धार्मिक रूप से कल का दिन बहुत महत्वपूर्ण है। कल क्या है? कल? अरे सावन का महीना और सोमवार, बाबा की नगरी बाबा का दिन, प्रेम का दिन प्रेमी की नगरी सच बोले बम की पुकार और काशी की हवा ने मुझ पर काले जादू का काम किया और रविवार की शाम यह फैसला किया कि प्रात:काल मंगला- आरती कर बाबा को रिझाया जाए। मुझे उस समय या विधा बहुत सरल प्रतीत हुई। रविवार संध्या गंगा जी की आरती देखी गई और वह भी मूसलाधार वर्षा में करीब एक हजार लोगों की भीड़ और मूसलाधार बारिश विश्वास नहीं हो रहा था कि एक भी व्यक्ति- बूढ़ा, बच्चा, बीमार स्वस्थ, नारी- पुरुष अपनी जगह से हिलने को तैयार नहीं थे। मैं कभी कैमरे कभी मोबाइल और कभी खुद को पानी से बचाने की कशमकश में लगी थी। कई बार चाहा कि यहां से भाग जाएं बारिश अब असहनीय हो रही थी। मैंने अपनी मजबूरी का एहसास कर लिया था। परंतु अचानक इस मजबूरी के बीच मेरा ध्यान आरती और मंत्रोच्चारण की तरफ गया। पूरी तरह से सूफी मनुष्यता वाली में सहसा मंत्रमुग्ध होकर यह चमत्कार देखकर हैरान रह गई। 7 पंडितो वाला एक समूह बड़ी ही यांत्रिक तरीके से व्यवस्थित की गई आरती का प्रायोजन कर रहा था। करीब 16 स्टेट्स में की जाने वाली आरती को करीब 2 घंटे लगे। पूरे समय दीप, धूप, कपूर लोबान सभी जलते रहे और बरसा रानी से निरंतर प्रतिस्पर्धा करते रहे। आखिर मेघराज की हार हुई। सभी कुछ एक चमत्कार की भांति प्रतीत हुआ। वहीं से यह प्रश्न मुझे परेशान करने लगा या क्या है? बनारस का जादू लोगों की भक्ति? आस्था या पागलपन? उधेड़बुन से रात के 12 बज गए 2:30 बजे सुबह नहा-धोकर बाबा की मंगला-आरती के लिए प्रस्थान किया गया। सुरक्षा कारणों से गाड़ी को मंदिर से काफी दूर रोक दिया गया। “बोले बम, बोले बम और कांवरियों का हुजूम सावन का सोमवार बाबा पर जल चढ़ाने का अवसर कोई छोड़ना नहीं चाहता था। आश्चर्य की सीमा नहीं रही जब मैंने ध्यान दिया कि डेढ़ किलोमीटर के रास्ते में आधी सड़क सिर्फ कांवरियों के लिए रिजर्व थी और भी आश्चर्य की बात थी कि करीब 10 हजार कांवरिया शाम से ही प्रतीक्षारत है। क्योंकि हम टिकट से जा रहे थे अतः भीड़ को चीरते हुए आगे बढ़ते गए। मेरा पूरा ध्यान अभी भी भक्ति या दीवानगी को विभिन्न पैमानों पर नापने में लगा था। कांवरियों की औसत आयु 16 से 17 वर्ष की थी इस उम्र में जहां दुनिया और रंगीनियां अपनी तरफ आकर्षित करती हैं वहीं यह सब क्या किसी पागलपन का शिकार है? क्या यह धर्म के वास्तविक रुप से वाकिफ है? क्या भ्रमित तो नहीं या सभी प्रश्न मुझे कौंध कर रहे थे कुछ दूर लाइन में इंतजार करने के बाद बाबा के दर्शन और आरती का आनंद मिला। मेरा ध्यान अभी भी बाहर खड़े कांवरियों के पास था। भीड़ इतनी कि वीआईपी भी अंदर नहीं जा पा रहे थे। सवाल केवल बाबा के श्रृंगार और आरती की एक झलक पाने का था। जबरदस्त धक्का-मुक्की के बीच किसी को किसी का लिहाज नहीं था जबकि यह वह सेशन था। जिसमें सुबह 2:30 से 3:30 की आरती केवल टिकट खरीद कर देखी जा सकती थी। यह कैसा धर्म कैसी आस्था सब कुछ कितना स्वकेंद्रित था। हर कोई सिर्फ अपने बारे में सोच रहा था उसी भीड़ में एक बेंच पर चढ़कर मुझे भी किसी प्रकार बाबा के श्रृंगार की एक झलक मिली। बाबा मुझे देख मुस्कुराए और संकेत किया। देखा सूफी आस्था वाले भी मेरी एक झलक को तरस रहे हैं। बेटा या मेरा जादू है जो बेंच पर चढ़कर बोल रहा है अचानक जोर का धक्का लगा और धड़ाम…… बाबा की आवाज कहीं खो गई। तभी मैंने कोने में एक कांवरिया को ध्यान में मग्न देखा। वह भी टिकट लेकर आया था परंतु उसे बाबा की झलक देखने को कोई जल्दी नहीं थी। उसका मन पूरी तरह शांत दिखाई दे रहा था। बस एकदम वहीं मेरे ज्ञान चक्षु खुल गए…. यह सिर्फ गहन आस्था हो सकती है जो वह कांवरिया आंखें बंद कर मन की आंखों से वह सब देख रहा था जो बाकी लोग जुगाड़ से धक्का-मुक्की से भी नहीं देख पा रहे थे। यह भक्ति थी जो बंद मंदिर पटो के पीछे इंतजार कर रहे 10,000 व्यक्ति, कांवरियों को रोक कर रखी थी। वाह,बोले बम बोले बम” बम भोले.. अनायास ही या स्वर मेरे मुख से जोर से निकला क्या आनंद था मानो बाबा ने मुझे अपनी गोद में उठा लिया था। भक्ति, आस्था,पागलपन, मैं मेरा शरीर कुछ भी ना रहा… बाकी रहा तो सिर्फ एक एहसास आत्मा और परमात्मा के संबंध का एहसास!डॉ.जयंती श्रीवास्तव 79, चांदगंज गार्डन, लखनऊ